Thursday, January 9, 2020

पेशवा बाजीराव (Peshwa Bajirao-1) का सम्पूर्ण इतिहास, जीवनी और उपाधियाँ हिंदी में पढ़िए।

Peshwa Bajirao-1
दोस्तों पेशवा बाजीराव (18 अगस्त, 1700 ई - 28 अप्रॅल, 1740 ई) एक महान सेनानायक थे इसमें कोई शक नहीं। उन्होंने कभी कोई भी युद्ध नहीं हरा था वो एक अजय योद्धा थे जिन्हे न तो हारने का डर था और ना ही मौत का। पेशवा बाजीराव ((Peshwa Bajirao-1)) जी ने मराठा साम्राजय के विस्तार में अपने जीवन को नौछावर कर दिया। उनके किये गए महान कार्यो को हम हमेशा याद करते रहेंगे, वो हमेशा हमारे दिल में अमर रहेंगे। आइये जानते है इन महान आत्मा के बारे में विस्तार से। बाजीराव प्रथम की सच्ची कहानी जो आपके रूह में साहस और देशभक्ति को भर देगा।
पूरा नाम (Full Name) बाजीराव बल्लाल भट्ट
शासन (Governance) मराठा साम्राज्य
शासन काल (Reign) 1720-1740 ई.
पूरा नाम (Full Name) बाजीराव बाळाजी भट (पेशवे), बाजीराव प्रथम
पिता (Father) बाळाजी विश्वनाथ पेशवा
माता (Mother) राधाबाई
उपाधियाँ (Titles) राऊ, श्रीमंत, महान पेशवा , हिन्दू सेनानी सम्राट
जन्म (Born) १८ अगस्त १७०० (18 अगस्त, 1700 ई.)
मृत्यु (Death) २८ अप्रैल १७४० (28 अप्रॅल, 1740 ई.)
मृत्यु स्थान (Death Place) रावेरखेडी, पश्चिम निमाड, मध्य प्रदेश
समाधी (Trance) नर्मदा नदी घाट, रावेरखेडी
पूर्वाधिकारी (Predecessor) बाळाजी विश्वनाथ पेशवा
उत्तराधिकारी (Successor) बाळाजी बाजीराव पेशवा
जीवन संगी (Life companion) काशीबाई, मस्तानी
संतान (Children's) बालाजी बाजीराव, रघुनाथराव
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पेशवा बाजीराव (Peshwa Bajirao-1) का जन्म - कहाँ, कब और कैसे?

महान सेनानी पेशवा बाजीराव जी का जन्म १८ अगस्त १७०० (18 August 1700) को कोकणस्थ चितपावन ब्राह्मण वंश के भट परिवार में हुआ था। बाजीराव जी जन्म से ही बहुत साहसी और हिम्मती थे, इन्होने सुरु से ही अपने पिता जी से सेनानायक के सभी गुण सीखे थे। बहपन से ही ये घुड़सवारी और तलवार बाजी में अति निपुण थे।

पेशवा बाजीराव (Peshwa Bajirao-1) का निजी जीवन

पेशवा बाजीराव की बचपन में ही शादी हो गयी थी, उनकी पहली पत्नी का नाम काशीबाई था जिनसे उनको तीन पुत्र प्राप्त हुए थे, जिसमे बालाजी बाजी राव को बाजीराव जी की मृत्यु के पश्चात पेशवा चुना गया था। इनकी दूसरी पत्नी जिनसे वो बेहद प्रेम करते थे उनका नाम था मस्तानी, जो बुंदेलखंड के राजा छत्रसाल की बेटी थी। बाजीराव ने उनके लिए पुणे के पास एक महल भी बनवाया जिसका नाम उन्होंने मस्तानी महल रखा। सन 1734 ईस्वी में बाजीराव और मस्तानी का एक पुत्र हुआ था जिसका नाम उन्होंने कृष्णा राव रखा था।

पेशवा बाजीराव (Peshwa Bajirao-1) द्वारा किये गए महान कार्य और अभियान

पेशवा बाजीराव जी बाळाजी विश्वनाथ पेशवा और राधाबाई जी के बड़े पुत्र थे। चौथे छत्रपति शाहूजी महाराज ने बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु हो जाने के बाद इन्हे अपना दूसरा पेशवा (1720-1740 ई.) नियुक्त किया था।. ये कभी भी किसी युद्ध में पराजित नहीं हुए, अतः लोग इन्हे प्रेम से अपराजित हिन्दू सेनानी सम्राट भी कहते थे। बाजीराव जी ने बहुत से अभियानों का नेतृत्व किया और उन सभी में विजय हासिल की।

बाजीराव प्रथम ने अपनी वीरता व युद्ध-पराक्रम के दम पर हर लड़ाई को जीत लिया। यह बहुत ही कुशल घुड़सवार थे बिलकुल शिवाजी महाराज की तरह। घोड़े पर बैठे-बैठे ही भाला चलाना, बनेठी घुमाना, बंदूक चलाना, यह सब उनके बाएँ हाथ का खेल था। घोड़े पर बैठकर बाजीराव के भाले की फेंक इतनी अचूक और जबरदस्त होती थी कि उनके सामने वाला घुड़सवार अपने घोड़े के सहित घायल होकर गिड़ जाता था। इसी साहस के दम पर इस मराठा सिपाही ने भारत के बहुत से क्षेत्रों को जीत लिया। यदि हम इनके कार्यो को गिनेंगे तो शायद इस पोस्ट की लिमिट ख़तम हो जाये, परन्तु इनके महान कार्य ख़त्म नहीं होंगे। इन्हे क्षत्रपति शिवाजी का अवतार भी कहाँ जाता है, क्युकी इनकी फुर्ती और युद्ध कौशल शिवाजी से बिलकुल मिलती है, आइये जानते है इनके द्वारा किये गए महान कार्य और अभियान।

निज़ाम-उल-मुल्क असफ जह प्रथम के खिलाफ अभियान

पेशवा बाजीराव के अभियानों में से एक था 4 जनवरी, 1721 में निज़ाम-उल-मुल्क असफ जह प्रथम के खिलाफ अभियान। जिसमे उन्होंने कई बार निजाम को समझाया, कई बार समझौते किये लेकिन वो नहीं माना और फिर से से मराठों के अधिकार के खिलाफ डेक्कन से कर वसूलने लगा। अंत में 27 अगस्त सन 1727 में बाजीराव ने निज़ाम के खिलाफ मोर्चा शुरू किया और निज़ाम के कई राज्यों जैसे जलना, बुरहानपुर, और खानदेश को अपने कब्जे में कर लिया।

इसके बाद भी निज़ाम नहीं माना तो बाजीराव जी ने 28 फरवरी, 1728 को युद्ध की घोषणा की और उसके बाद बाजीराव और निज़ाम की सेना के बिच एक भयंकर युद्ध हुआ जिसे ‘पल्खेद की लड़ाई’ कहां जाता है। इस युद्ध में निज़ाम की सेना का सम्पूर्ण विनास हो गया और निज़ाम की हार हुई। जिससे उस पर मजबूरन शांति बनाये रखने के लिए दवाब डाला गया। क्युकी वह युद्ध हार चूका था इसीलिए उसे अपनी जान बचानी थी तो उसे अपने आप को सुधारना पड़ा और बाजीराव की बात माननी पड़ी।

मालवा का अभियान

यह अभियान 1723 में दक्षिण में मालवा के खिलाफ हुआ था यह अभियान बाजीराव के लिए बहुत ही खास था। क्युकी इसमें मराठा के प्रमुख रानोजी शिंदे, मल्हार राव होलकर, उदाजी राव पवार, तुकोजी राव पवार, और जीवाजी राव पवार थे, जिन्होंने इस अभियान को सफलतापूर्वक सफल बनाया। अक्टूबर 1728 में बाजीराव ने एक विशाल सेना इकट्ठा की और अपने छोटे भाई चिमनाजी अप्पा के नेतृत्व में उसे मालवा भेजा जिसमे कुछ प्रमुख मराठा सेनानी जैसे शिंदे, होलकर और पवार थे। 29 नवम्बर 1728 को चिमनाजी के नेतृत्व वाली सेना ने मुग़लों को अमझेरा में हरा दिया और इसी प्रकार से उन्होंने मराठी हिन्दुओं की मदद से गुजरात राज्य को पूरी तरह से जीत लिया।

बुंदेलखंड का अभियान

बुंदेलखंड के महाराजा छत्रसाल ने मुग़लों के खिलाफ विद्रोह छेड़ दिया था, इसी कारण से दिसम्बर 1728 में मुग़लों ने मुहम्मद खान बंगश के नेतृत्व वाली सेना की मदद से बुंदेलखंड पर आक्रमण कर दिया और उनके परिवार के लोगों को बंधक बना लिया था। महाराजा छत्रसाल की बेटी मस्तानी ने बाजीराव से बार बार मदद मांगी जिसके जवाब में बाजीराव ने सन 1729 में अपनी सेना सहित मुगलो पर आक्रमण कर दिया और महाराजा के परिवार को छुड़ाया और उनका सम्मान वापस दिलाया।

इसके बदले में महाराजा बाजीराव को बहुत कुछ देना चाहते थे लेकिन बाजीराव ने वो सब लेने से मना कर दिया क्युकी उन्हें मदद का अहसान नहीं चाहिए था। लेकिन फिर भी महराज ने उनके सम्मान में उन्हें बुंदेलखंड का एक बहुत बड़ा जागीर सौंपा जिसे न चाहते हुए भी उन्हें लेना पड़ा। इसके साथ साथ महाराजा छत्रसाल ने अपनी मृत्यु 1731 से पहले अपने कुछ मुख्य राज्य को भी मराठो को सौंप दिया था। आपको बता दे की इसी अभियान के तहत महाराजा ने बाजीराव से अपनी बेटी मस्तानी का विवाह भी करवाया था।

दिल्ली अभियान

पेशवा बाजीराव प्रथम को पहले से ही पता था की मुग़ल साम्राज्य का अंत निकट है, इसीलिए उन्होंने महाराष्ट्र के बाहर के और हिन्दू राजाओं की सहायता से मुग़ल के साम्राज्य के स्थान पर 'हिन्दू पद पादशाही' को बनाने की योजना बनाई थी। इसी कारण से उन्होंने मराठा के सेनाओं को उत्तर भारत की ओर भेजा। जिससे पतन की ओर जा रहे मुग़ल साम्राज्य की जड़ पर अन्तिम हमला किया जा सके। बाजीराव पेशवा प्रथम ने मराठा की शक्ति के प्रदर्शन के लिए 29 मार्च, 1737 को दिल्ली पर हमला बोल दिया था। जिसके परिणाम स्वरूप मुग़ल शहंशाह मुहम्मदशाह ने सआदत खान को उन्हें रोकने को कहा। जिसमे उन्होंने उसे हराया जिसके कारन मात्र तीन दिन के अंदर दिल्ली प्रवास के दौरान उनके डर से मुग़ल बादशाह मुहम्मदशाह दिल्ली तक को छोड़ने के लिए तैयार हो गया था।

पुर्तगालियों के खिलाफ अभियान

पुर्तगालियों ने भारत के कई पश्चिमी तटों पर कब्ज़ा कर लिया था। साल्सेट द्वीप पर उन्होंने अवैध तरीके से एक फैक्ट्री भी बनवा लिया था। मार्च 1737 में पेशवा बाजीराव ने अपनी सेना की एक टुकड़ी को चिमनाजी अप्पा के नेतृत्व में पश्चिमी तटों की ओर भेजा। चिमनाजी ने पुर्तगालियों से भीषण युद्ध किया जिसे वसई का युद्ध कहाँ जाता है, जिसमे उनकी सेना ने थाना किला और बेस्सिन पर कब्ज़ा कर लिया और इस तरह से उन्होंने पुर्तगालियों को वहाँ से खदेड़ दिया।

पेशवा बाजीराव (Peshwa Bajirao-1) की मृत्यु कब और कैसे?

ये मान्यता है की पेशवा बाजीराव को उनकी दूसरी पत्नी मस्तानी से दूर कर दिए गया था जिसका सदमा वो बरदास न कर सके। इसके अलावा वो काफी दिनों ने बीमार भी चल रहे थे इसी कारण से 28 अप्रैल 1740 को जिस समय वो इंदौर के पास खर्गोन शहर में रुके हुए थे अचानक दिल का दौरा पड़ा और उनकी मृत्यु हो गयी। मराठा साम्राज्य के लिए ही नहीं पुरे भारतवर्ष के लिए ये दिन बहुत दुखी का था, क्युकी हमने अपने महान सिपाही को खो दिया था। आज भी भारत के इस वीर और अमर सपूत को हमेशा याद किया जाता है। इन्होने हमे अपने अदम्य साहस का परिचय दिया था, अपने लिए तो सभी जीते है लेकिन जो देश के लिए जीता है असल में वही सम्मान का हक़दार होता है।

इसे भी पढ़िए: - संजय लीला भंसाली की फिल्म बाजीराव मस्तानी के माध्यम से पेशवा बाजीराव (Peshwa Bajirao-1) को इतिहास ने फिर से याद किया है। इनके साथ बाकि के योद्धाओ की तरह इन्साफ देर से किया गया, लेकिन ख़ुशी की बात ये है की आज सभी इस वीर योद्धा की वीरता का बखान करते है और सच्चे दिल से इनका स्मरण करते है।

पेशवा जी के बारे में ये कुछ सुनहरे शब्द है जिसे मैंने फेमस हिंदी के माध्यम से आपको बताने की कोशिश की है। आशा करता हूँ आपको यह पोस्ट पसंद आया होगा, धन्यवाद।
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